Sunday, May 15, 2011

दूर हो सकती है 28 पैसे में रेलवे की आधी समस्‍याएं, बशर्ते

अर्जुन देशप्रेमी
यदि सरकार या रेलवे के पास इच्‍छा शक्ति हो तो 28 पैसे से भी कम के खर्च पर अनगिनत अरूणिमाओं को बचाया जा सकता है, रेलवे में सुरक्षा को चाक चौबंद किया जा सकता है। इससे रेलवे की आधी समस्‍याएं दूर हो सकती हैं, लोगों का भरोसा रेल वे पर बढ सकता है, सरकार की आये दिन होने वाली किरकिरी कम हो सकती है। जो फायदे इन उपायों से होंगे, उनसे जो लाभ होगा वह इससे कहीं ज्‍यादा की बचत करा देगा। फिर भी जरूरत हो तो सरकार इतने पैसे किराये में भी बढा सकती है। शायद ही किसी को आपतित होगी प्रति टिकट 28 पैसे बढाने में।

ट्रेनों में लोगों के साथ क्‍या क्‍या होता है, यह बताने की बात नहीं रह गई है। लगभग हर वह शख्‍स जिसने कभी ट्रेन में सफर किया है जानता है कि ट्रेनों में क्‍या क्‍या होता है। आज अरुणिमा उर्फ सोनू सिन्‍हा को बदमाशों ने चेन झपटने के लिए ट्रेन से बाहर फेंक दिया तो खबर थोडी बडी बन गई क्‍योंकि वह एक उदीयमान खिलाडी थी। पर न जाने कितनी अरुणिमाएं आये दिन ट्रेनों से फेंकी जाती हैं, छीनाझपटी की शिकार होती हैं, कितनों के साथ बदतमीजी होती है। कितनी ही अपने साथ होने वाली घटनाओं को खून का घूंट पीकर खामोश हो जाती हैं।

खबरों पर नजर रखने वाले आपको सैकडों की संख्‍या में इसकी मिसाल दे सकते हैं। क्‍या क्‍या होता है ट्रेनों में जो खबरें बनती हैं और भुला दी जाती हैं। न सिर्फ हमारे द्वारा बल्कि उस रेलवे और प्रशासन के द्वारा जिनके उपर हमारी सुरक्षित यात्रा की जिम्‍मेदारी होती है।

मसलन

1: किसी तकनीकी कारण से यदि ट्रेन किसी सिगलन पर खडी हो या किसी और वजह से, वहां से भी लोग ट्रेन में चढ लेते हैं। इसमें सबसे बडा खतरा तो आतंकवाद से जूझ रहे इस देश में ऐसे स्‍थानों से आतंकियों के ट्रेनों में घुसने का होता है। यदि किसी दिन ऐसा हो जाये तो संभव है वे डिब्‍बों में बम रख दें, अपहरण कर लें, मुंबई के तर्ज पर फायरिंग कर दें या गोधरा की तर्ज पर यात्रियों को जिंदा जला दें। मुंबई में तो ऐसा हो ही चुका है, समझौता एक्‍सप्रेस की याद भी ताजा है और साबरमती का किस्‍सा भी है। चूंकि ऐसे स्‍थानों पर सुरक्षा तो होती नहीं या होती है तो दो या तीन राइफलधारी होते हैं जो इनका मुकाबला भी नहीं कर सकते। पर इस बारे में कोई सोचता ही नहीं। लोग भगवान भारोसे यात्रा करें, रेलवे या प्रशासन को क्‍या।

2: ट्रेन के भीतर भारी भरकम भीड जिसके कारण लोग ददरवाजों पर लटक कर यात्रा करते हैं, गिरते हैं, मरते हैं या अपाहिज होते हैं या घायल होते हैं।

3: अक्‍सर ऐसा देखा गया है कि जिसको जहां मन करता है, चेन पुल करता है। जैसे ही ट्रेन धीमी होती है, उतर कर दौड लगा देता है। हजारों की संख्‍या में ट्रेन में यात्रा कर रहे लोगों का और रेलवे का भारी भरकम समय और धन इसमें जाया होता है, ट्रेनें इस वजह से घंटों लेट होती हैं।

4: जिसको छोटे से स्‍टेशन पर भी जाना होता है, वह लोकल पैसेंजर के नाम पर न सिर्फ लंबी दूरी के ट्रेनों में सवार होता है, वरन दादागिरी करता है, बदतमीजी करता है, मारपीट करता है, चेन पुल कर कहीं भी उतर जाता है।

5: ट्रेनों में लूटपाट की घटनाएं भी इसी कारण होती हैं। बदमाशों का गिरोह या तो ऐसे स्‍थानों पर चढता है, या उनका कोई साथी किसी स्‍टेशन से ट्रेन में सवार होकर बीच रास्‍तें में चेन खींचकर ट्रेन रुकवा देता है जहां से हथियाबंद बदमाश ट्रेन में सवार होकर लूटपाट करते हैं और अगला स्‍टेशन आये उसके पहले ही से चेन खींचकर उतर जाते हैं।

इस तरह की अनेक और भी बातें हैं जो न सिर्फ आम आदमी को परेशान करती हैं, वरन रेलवे और प्रशासन को भी परेशान करती हैं। पर करता कोई कुछ नहीं है। क्‍यों? क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि उसपर तो इतनी बडी राशि लग जाएगी कि वे इसे जुटा ही नहीं सकते हैं।

पर रेलवे और प्रशासन में इच्‍छाशक्ति हो तो इसे मामूली खर्च पर किया जा सकता है जिससे ये सारी घटनाएं, दुर्घटनाएं रोकी जा सकती हैं, कम की जा सकती हैं और यात्रा को सुरक्षित किया जा सकता है।

उपाय क्‍या है?

बहुत ही सरल उपाय है। ट्रेनें चले ही तब सभी दरवाजे बंद हो जायें। ठीक उसी तरह जैसे मेट्रो में होता है। यदि ट्रेन के दरवाजे बंद न हों तो ट्रेन चले ही नहीं या चले तो भी ड्राइवर, गार्ड और डिब्‍बों में सवार टीटी को पता चल जाये कि किस कोच में कौन सा गेट बंद नहीं हुआ है। ऐसे में ड्राइवर हूटर दे और टीटी जाकर उस गेट को बंद करे जिसके बाद ट्रेन चले। इसके बाद ट्रेन के डिब्‍बों के दरवाजे तभी खुलें जब ड्राइवर, गार्ड या टीटी उसे खोलें। और ऐसा स्‍टेशन आने पर ही हो। किसी आकस्मिक स्थि‍ति में इनके द्वारा बीच रास्‍ते में भी ऐसा किया जा सकता है।

तकनीक क्‍या है ?

इसके लिए सामान्‍य रूप से दरवाजों को बंद करने वाले चुंबकीय तकनीक का प्रयोग किया जा सकता है जिसके माध्‍यम से ड्राइवर एक स्‍वीच ऑन करके ट्रेन के दरवाजों पर लगे यंत्र में विद्युत प्रवाह कर चुंबकीय पट्टी को इस तरह से जोडेगा कि दरवाजे बंद हो जायें। ऐसा करते समय दरवाजे पांच से सात सेकेंड में बंद होंगे जिससे बीच में कोई यात्री फंसेगा नहीं। यदि कोई यात्री बीच में आता भी है तो उसे कोई नुकसान नहीं होता है। ऐसा आपने अपने कार्यालयों में देखा होगा। मेट्रो के दरवाजों के बंद होने में जितना समय लगता है उससे यह समय काफी ज्‍यादा होगा। पूरे यंत्र में चुंबकीय पट्टी के साथ वायर और डोर क्‍लोजर लगेंगे जिनपर बहुत खर्च नहीं आता है। वैसे सरकार या रेलवे चाहे तो दूसरी तकनीक का उपयोग भी कर सकती है जो भारत में आसानी से उपलब्‍ध है। पर उसमें खर्च का मामला आडे आएगा। ऐसे में इसी सामान्‍य तकनीक का उपयोग ही काफी होगा।

लागत और व्‍यावहारिकता

देश में रेलवे रोजाना लगभग 2 करोड लोगों को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचाती है। लोकल यात्रियों को छोड दें तो लगभग एक करोड लोग रोजाना लंबी दूरी की ट्रेनों में यात्रा करते हैं। एक डिब्‍बे में औसतन 100 के हिसाब से इसके लिए रेलवे को एक लाख डिब्‍बों में य‍ह सुविधा देनी होगी। इस काम के लिए लागत देखी जाये तो नाममात्र है। ट्रेन के एक कोच में अमूमन चार गेट होते हैं। यानि कुल 4 लाख ददरवाजों पर यह सुविधा देनी होगी। देश में मौजूद तकनीक के हिसाब से एक कोच में चार डिब्‍बों में ऐसा करने के लिए एक मोटे अनुमान के हिसाब से लगभग 10000 रु खर्च करने होंगे हालांकि बडे पैमाने पर ऐसा करने पर यह खर्च 2000 रुपये से भी कम में ऐसा करना संभव है। पर यदि 10000 रुपये भी मान लिया जाये तो रेलवे को पूरी व्‍यवस्‍था पर कुल 500 करोड रुपये खर्च करने होंगे। इसकी लाइफ यदि पांच साल भी मानी जाये तो सालाना खर्च 100 करोड रुपये आता है। यदि सालाना यात्रियों की संख्‍या को देखें तो यह 365 करोड होते हैं यानि प्रति यात्री प्रति वर्ष का खर्च 28 पैसे से भी कम आता है।

अब क्‍या यह माना जा सकता है कि सरकार या रेलवे इतनी बडी सुरक्षा के लिए प्रति खत्री प्रति वर्ष 28 पैसे भी खर्च नहीं कर सकती या इस भार को वहन करने की स्थिति में नहीं है। संभवत: हर कोई मानेगा कि यह संभव है, बहुत आसानी से संभव है। लोकल लंबी दूरी के यात्रियों दोनों को जोडें तो खर्च लगभग 56 पैसा बैठता है।

रही बात व्‍यावहारिकता की, तो यह पूरी तरह से न सिर्फ व्‍यावहारिक है, वरन समय की यही मांग है। ऐसा करने के लिए अलग से स्‍टाफ नियुक्‍त करने की भी आवश्‍यकता नहीं है। मेट्रो की तरह इसे दरवाजे वैसे भी हर एक या दो मिनट पर तो खुलने नहीं हैं। जब स्‍टेशन पर गाडी पहुंचेगी तब ड्राइवर को पता होगा कि उसका प्‍ललेटफार्म किस तरु है। ऐसे में वह उसी तरफ के दरवाजे खोलेगा। बीच में गाडी न रुकने के कारण किसी भी तरह की आतंकी घटना की आशंका कम होगी।

ट्रेनों में आपराधिक वारदातें रुकेंगी। कोई किसी को ट्रेन से नीचे नहीं फेंक सकेगा। किसी के नीचे गिरने की आशंका खत्‍म हो जाएगी। अगर कोई किसी वारदात को अंजाम देता है तो वह चलती ट्रेन या उसकी धीमी रफ्तार का फायदा उठाकर भाग नहीं पाएगा। बेटिकट यात्रा पर प्रभावी लगाम लग सकेगा। रेलवे स्‍टेशनों पर प्रभावी सुरक्षा हो पाएगी। वैसे भी लंबी दूरी की ट्रेनें बडे स्‍टेशनों पर ही रुकती हैं जहां सुरक्षा को चाक चौबंद करना छोटे स्‍टेशनों की तुलना में आसान है। लूटपाट करने वाले या तो चढेंगे नहीं या वारदात करेंगे तो पकडे जाएंगे।

चेन खींचे जाने की स्थिति में भी तभी ददरवाजे खेले जाएंगे जब गार्ड या टीटी उस डिब्‍बे में पहुंचेंगे जिसमें चेन खींची गई होगी। इससे किसी को भागने का मौका नहीं मिलेगा और गलत तरीके से चेन खींचने वालों के कार्रवाई हो सकेगी जिससे गलत तररीके से चेन खींचने पर रोक लग सकेगी।

No comments: